Tuesday, 6 April 2021

 १८ अप्रैल २०२१

संभवनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक ---विद्यावाचस्पति  डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैनभोपाल/पुणे 

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           जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में सीता नदी के उत्तर तट पर एक ‘कच्छ' नाम का देश है। उसके क्षेमपुर नगर में राजा विमलवाहन राज्य करता था। एक दिन वह किसी कारण से विरक्त होकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के पास दीक्षा लेकर ग्यारह अंग श्रुत को पढ़कर उन्हीं भगवान के चरण सान्निध्य में सोलह कारण भावना द्वारा तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करने वाले तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर लिया। संन्यासविधि से मरण कर प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में तेतीस सागर की आयु वाला अहमिन्द्र देव हो गया।

        गर्भ और जन्म

       इसी जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी के राजा दृढ़राज इक्ष्वाकुवंशीय, काश्यपगोत्रीय थे। उनकी रानी का नाम सुषेणा था। फाल्गुन शुक्ला अष्टमी के दिन, मृगशिरानक्षत्र में रानी ने पूर्वोक्त अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया और कार्तिक शुक्ला पौर्णमासी के दिन मृगशिरा नक्षत्र में तीन ज्ञानधारी पुत्र को जन्म दिया। इन्द्र ने पूर्वोक्त विधि से गर्भकल्याणक मनाया था, उस समय जन्मोत्सव करके ‘संभवनाथ' यह नाम रखा। इनकी आयु साठ लाख पूर्व की तथा ऊँचाई चार सौ धनुष थी।

       तप

      भगवान को राज्य सुख का अनुभव करते हुए जब चवालीस लाख पूर्व और चार पूर्वांग व्यतीत हो चुके,तब किसी दिन मेघों का विभ्रम देखने से उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया।

      तब भगवान देवों द्वारा लाई गई ‘सिद्धार्था' पालकी में बैठकर सहेतुक वन में शाल्मली वृक्ष के नीचे जाकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गये।

      भगवान की प्रथम पारणा का लाभ श्रावस्ती के राजा सुरेन्द्रदत्त ने प्राप्त किया था।

     केवलज्ञान और मोक्ष

       संभवनाथ भगवान चौदह वर्ष तक छद्मस्थ अवस्था में मौन से तपश्चरण करते हुए दीक्षा वन में शाल्मली वृक्ष के नीचे कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन मृगशिर नक्षत्र में अनन्तचतुष्टय को प्राप्त कर केवली हो गये। इनके समवसरण में चारूषेण आदि एक सौ पाँच गणधर थे, दो लाख मुनि, धर्मार्या आदि तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएँ, तीन लाख श्रावक, पाँच लाख श्राविकाएँ, असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यात तिर्यंच थे। अन्त में जब आयु का एक माह अवशिष्ट रहा, तब उन्होंने सम्मेदाचल पर जाकर एक हजार राजाओं के साथ प्रतिमायोग धारण किया तथा चैत्रमास के शुक्लपक्ष की षष्ठी के दिन सूर्यास्त के समय मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त किया। देवों द्वारा किए गए पंचकल्याणक महोत्सव को पूर्ववत् समझना चाहिए।

     श्रीफल लौंग बदाम छुहारा ,एला पिस्ता ,दाख रमें .

     ले फल प्रासुक पूंजू देहु, अक्षयपद   नाथ    हमें 

    संभव -जिन के चरण चरचते ,सब आकुलता मिट जावें 

      निजी-निधि ज्ञान दरश सुख नीरज ,निराबाध भविजन पावे 

           विद्यावाचस्पति   डॉक्टर  अरविन्द प्रेमचंद जैन-- ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104  पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753

                वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे  ४११०२७

 

(१५ अप्रैल २०२१ )

भगवान कुंथुनाथ का ज्ञानकल्याणक----  विद्यावाचस्पति   डॉक्टर  अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल/पुणे

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             भगवान का गर्भकल्याणक श्रावण कृष्णा दशमी को हुआ, दीक्षाकल्याणक चैत्र शुक्ला तृतीया को हुआ तथा जन्म, केवलज्ञान और मोक्षकल्याणक वैशाख शुक्ला प्रतिपदा को हुआ है। भगवान के शरीर की ऊँचाई १४० हाथ प्रमाण थी, बकरे का चिन्ह था, ऐसे सत्रहवें तीर्थंकर कुंथुनाथ भगवान हम और आपको शाश्वत सुख प्रदान करें।

             कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में कुरुवंशी महाराज सूरसेन राज्य करते थे, उनकी पट्टरानी का नाम श्रीकांता था। उस पतिव्रता देवी ने देवों के द्वारा की हुई रत्नवृष्टि आदि पूजा प्राप्त की थी। श्रावण कृष्ण दशमी के दिन रानी ने सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया, उस समय इन्द्रों ने आकर भगवान का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया और माता-पिता की पूजा करके स्वस्थान को चले गये। क्रम से नवमास व्यतीत हो जाने पर वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन पुत्ररत्न का जन्म हुआ, उसी समय इन्द्रादि सभी देवगण आये और बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर महामहिम जन्माभिषेक महोत्सव करके अलंकारों से अलंकृत किया एवं बालक का नाम ‘‘कुंथुनाथ’’ रखा। वापस लाकर माता-पिता को सौंपकर देवगण स्वस्थान को चले गये। पंचानवे हजार वर्ष की इनकी आयु थी, पैंतीस धनुष ऊँचा शरीर था और तपाये हुए स्वर्ण के समान शरीर की कांति थी। ये तेरहवें कामदेव एवं छठे चक्रवर्ती पद के धारक थे। तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष कुमार काल के बीत जाने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और इतना ही काल बीत जाने पर उन्हें वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन चक्रवर्ती की लक्ष्मी मिली। इस प्रकार वे बाधा रहित, निरन्तर दश प्रकार के भोगों का उपभोग करते थे, सारा वैभव शांतिनाथ भगवान के समान ही था। चक्रवर्ती पद के साम्राज्य का उपभोग करते हुए भगवान के तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष व्यतीत हो गये।

             किसी समय भगवान को पूर्वभव का स्मरण हो जाने से आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया और वे भोगों से विरक्त हो गये, उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर प्रभु का स्तवन- पूजन किया। उन्होंने अपने पुत्र को राज्यभार देकर इन्द्रों द्वारा किया हुआ दीक्षाकल्याणक उत्सव प्राप्त किया। देवों द्वारा लाई गई विजयानाम की पालकी पर सवार होकर भगवान सहेतुक वन में पहुँचे, वहाँ तेला का नियम लेकर वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन कृत्तिका नक्षत्र में तिलक वृक्ष के नीचे सायंकाल के समय एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा धारण कर ली। उसी समय प्रभु को मन:पर्यय ज्ञान उत्पन्न हो गया। दूसरे दिन हस्तिनापुर के धर्ममित्र राजा ने भगवान को आहारदान देकर पंचाश्चर्य को प्राप्त किया। इस प्रकार घोर तपश्चरण करते हुए प्रभु के सोलह वर्ष बीत गये।

           किसी दिन भगवान तेला का नियम लेकर तप करने के लिए वन में तिलक वृक्ष के नीचे विराजमान हुए। वहाँ चैत्र शुक्ला तृतीया के दिन उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। उसी समय देवों ने समवसरण की रचना की और केवलज्ञान कल्याणक की पूजा की। भगवान के समवसरण में स्वयंभू को आदि लेकर पैंतीस गणधर, साठ हजार मुनिराज, साठ हजार तीन सौ पचास आर्यिकाएँ, दो लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ, असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यात तिर्यंच थे। भगवान दिव्यध्वनि के द्वारा चिरकाल तक धर्मोपदेश देते हुए विहार करते रहे। भगवान का केवलीकाल तेईस हजार सात सौ चौंतीस वर्ष का था।

           जब भगवान की आयु एक मास की शेष रह गई, तब वे सम्मेदशिखर पर पहुँचे और प्रतिमायोग धारण कर लिया, वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन रात्रि के पूर्व भाग में समस्त कर्मों से रहित, नित्य, निरंजन, सिद्धपद को प्राप्त हो गये। ये कुंथुनाथ भगवान तीर्थंकर होने के तीसरे भव पहले सिंहरथ राजा थे, मुनि अवस्था में सोलहकारण भावनाओं के प्रभाव से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया, पुन: सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुए, वहाँ से आकर कुंथुनाथ नाम के सत्रहवें तीर्थंकर, छठे चक्रवर्ती और तेरहवें कामदेव पद के धारक हुए हैं।

          तिलोयपण्णत्ति और उत्तरपुराण के अनुसार इन भगवान के भी गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान ये चारों कल्याणक हस्तिनापुर में ही हुए हैं। भगवान का गर्भकल्याणक श्रावण कृष्णा दशमी को हुआ, दीक्षाकल्याणक चैत्र शुक्ला तृतीया को हुआ तथा जन्म, केवलज्ञान और मोक्षकल्याणक वैशाख शुक्ला प्रतिपदा को हुआ है। भगवान के शरीर की ऊँचाई १४० हाथ प्रमाण थी, बकरे का चिन्ह था, ऐसे सत्रहवें तीर्थंकर कुंथुनाथ भगवान हम और आपको शाश्वत सुख प्रदान करें।

         सुदी-तिय चैतसु चेतन ,चहुँ अरि छय करिता दिन

        भई  समवस्रत भवि सुधर्म .जजूँ पद ज्यों पाद पाइव धर्म

विद्यावाचस्पति   डॉक्टर  अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104  पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753

                वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे  ४११०२७

 (समसामयिक चिंतन )

(अर्धनग्न अभिनेत्रियों औरआधुनिक महिलाओं की समर्पित)

क्या  कम कपड़ा पहनना आधुनिकता का घोतक हैं ----विद्यावाचस्पति  डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन , भोपाल /पुणे 

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           किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी गुणवत्ता या योग्यता द्वारा जाना जाता हैं और समयानुसार कपड़ो का पहनना भी योग्यता हैं .पहले समय एक डुप्टी कलेक्टर अपनी पदस्थापना पर उपस्थित होने गया .उसने उपचारिकतावश कलेक्टर से मिलने गया .कलेक्टर ने उसे देखकर कोई रिस्पांस नहीं दिया .डिप्टी कलेक्टर बाहर आकर स्टेनो से मिला तो स्टेनो ने कहा आप समुचित ड्रेस पहनकर नहीं आये यानी सूट और टाई .

             पहनावा से व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता हैं .आजकल तो सम्पन्न व्यक्ति और स्त्रियां फाटे जीन्स पहनकर आते जाते हैं .फ़टे कपड़ा पहनना गरीबी की निशानी मानी जाती हैं और आज अंग प्रदर्शन करना आवश्यक हो गया .

          एक स्त्री के कपड़े उतारने पर महाभारत हो गया था । और अब कपड़े पहनने को बोल दो तो महाभारत हो रहा है।धन्य हो कलयुगी मोर्डन नारी

           सब कहते हैं "पेट के लिए तो सब करना ही पड़ता है।" कोई पूछे कि कितना बड़ा पेट है उनका? असल में तन की बात ही नहीं है, सारा झगड़ा मन का है। मन ही तन की ओट में सब झंझट करता है। तन की माँग ही कितनी है?

          तन रोटी ही माँगता है, मन माँगता है मक्खन, शीशे की मेज, एयरकंडीशन्ड कमरा, और न मालूम क्या क्या? तन तो दो कपड़ों में ही राजी है, मन को भरी अलमारी भी कम है। नींद चढ़ने पर तन को तो पत्थर से भी परहेज नहीं, मखमली बिस्तर मन को चाहिए। तन को तो छप्पर भी चलता है, पर मन को आलीशान कोठी चाहिए।

       तन दो रोटी खाकर कहता है बहुत हो गया, मन कहता है अभी और। शूगर है, तन को मीठा नहीं चलता, मन कहता है ले लो, बाद में दवा ले लेंगे। तन कहे नींद लो, मन कहे कुछ देर तो रुको। तन को कष्ट हो न हो, मन चीख मारता ही है।

        देखो, तन अधिक माँगता नहीं, पर मन है कि कम में मानता नहीं। मौत आती है तो तन थोड़े ही विरोध करता है? मन ही बचने के उपाय खोजता है। तो ठीक किसे करना है? तन को या मन को?

      एक मित्र ने लिखा है-

"      पांच ना मार, पचीसा नै बन्द कर।

       जद जानु तेरी रजपुती॥"

         पाँच माने पंचतत्वों से बना तन साधने से क्या होगा? हिम्मत है तो पच्चीस से बने मन को रोको! तन तो लाख बार छूट कर भी नहीं छूटता, मन से छूटो, तब बात है।

        और तन ठीक करना होता तो बड़ी कठिनाई होती, वह तो जैसा बन गया, बन गया, अब कहाँ से ठोक पीट कर बदलते? पर मन तो विचारों का संग्रह मात्र है। उसे ठीक करना कठिन नहीं, बस सही तरीका मालूम हो जाए।

       ध्यान दें, तन और परमात्मा के बीच की कड़ी मन है। यह मन जड़ तन से जुड़े तो दुख है, चेतन परमात्मा से जुड़े तो आनन्द। हैरानी की बात नहीं कि भगवान का एक नाम मनमोहन है, तनमोहन नहीं।

         गलती यह है कि हम इसे परमात्मा से भी जोड़ते हैं तो परमात्मा के लिए नहीं जोड़ते, तन के लिए ही जोड़ते हैं।

      "हैरान हूँ मैं अपनी बेगार हसरतों पर।

         हर चीज़ माँगी तुझसे, तेरे अलावा॥"

         लाख मुर्दों को जला कर भी इस मन को चेत नहीं आता, यह फिर से मुर्दे की ओर ही भागता है। ये समझता क्यों नहीं कि यह जगत तो मुर्दों की मंडी है, जो मर चुके वो अतीत के मुर्दे थे, जो अर्थी पर पड़ा है वो वर्तमान का मुर्दा है, जो इसे उठा ले जा रहे हैं वो भविष्य के मुर्दे हैं।

       तन को हार पहनाने से क्या होगा? बात तो तब है जब यह मन का हार मनमोहन को पहना दें।

        आजकल महिलाओं को कपडा पहनना नहीं चाहती हैं या कम से कम .वे मात्र डेढ़ अंग वो भी पारदर्शी कपडे पहनकर लगता नहीं की वे कपडा पहनती या या नहीं .ये पहनावा पश्चिम की देन हैं इसने तन के साथ मन को विकृत किया और आज यह स्थिति हैं की नारी स्वयं अपना दिखावा करने से नहीं चूँक रही .

          आजकल माँ बाप भाई का कोई परहेज़ नहीं रहा .अंग प्रदर्शन आम बात हो गयी .क्या परिधान भी अपराध को उत्प्रेरित करने का एक कारण नहीं हैं .यह जग जाहिर हैं विपरीत लिंगों में आकर्षण होना लाजिमी हैं और होता हैं ब्रह्मा जी भी अपने आपको नहीं सम्हाल पाए थे.

             वैसे कोई भी अभिनेत्री साक पाक नहीं रही और न बचने की उम्मीद हैं इसलिए ंग प्रदर्शन से कोई परहेज़ ही होता .

         विद्यावाचस्पति   डॉक्टर  अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104  पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753

                वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे  ४११०२७


Monday, 5 April 2021

 ( ७ अप्रैल २०२१)

विश्व स्वास्थ्य दिवस ७ अप्रैल, २०२१----- विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैनभोपाल/पुणे
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा वर्ष २०२० में विश्व स्तर पर कोरोना संक्रमण के कारण पूरा विश्व संक्रमित और भयग्रस्त रहा .इस दौरान बहुत अधिक संक्रमण और मौते हुई .इस संघठन के कारण महती भूमिका निभायी गयी .इस संघठन की पहल से बहुत शीघ्र नियंत्रण हुआ पर जनता का सहयोग भरपूर न मिलने के कारण और लापरवाही के कारण मौतें बहुत हुई .इस संघठन का पूरे विश्व में स्वास्थ्य जागरूकता का कार्यक्रम किये जाते हैं .
वैश्विक स्वास्थ्य के महत्व की ओर बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में हर वर्ष 7 अप्रैल को पूरे विश्व भर में लोगों के द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। डबल्यूएचओ के द्वारा जेनेवा में वर्ष 1948 में पहली बार विश्व स्वास्थ्य सभा रखी गयी जहाँ 7 अप्रैल को वार्षिक तौर पर विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने के लिये फैसला किया गया था। विश्व स्वास्थ्य दिवस के रुप में वर्ष 1950 में पूरे विश्व में इसे पहली बार मनाया गया था। डबल्यूएचओ के द्वारा अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के खास विषय पर आधारित कार्यक्रम इसमें आयोजित होते हैं।
स्वास्थ्य के मुद्दे और समस्या की ओर आम जनता की जागरुकता बढ़ाने के लिये वर्षों से मनाया जा रहा ये एक वार्षिक कार्यक्रम है। पूरे साल भर के स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिये और उत्सव को चलाने के लिये एक खास विषय का चुनाव किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य दिवस वर्ष 1995 के खास विषयों में से एक था वैश्विक पोलियो उन्मूलन। तब से, इस घातक बीमारी से ज्यादातर देश मुक्त हो चुके हैं जबकि दुनिया के दूसरे देशों में इसकी जागरुकता का स्तर बढ़ा है।
वैश्विक आधार पर स्वास्थ्य से जुड़े सभी मुद्दे को विश्व स्वास्थ्य दिवस लक्ष्य बनाता है जिसके लिये विभिन्न जगहों जैसे स्कूल, कॉलेजों और दूसरे भीड़ वाले जगहों पर दूसरे संबंधित स्वास्थ्य संगठनों और डबल्यूएचओ के द्वारा सालाना विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। विश्व में मुख्य स्वास्थ्य मुद्दों की ओर लोगों का ध्यान दिलाने के साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना को स्मरण करने के लिये इसे मनाया जाता है। वैश्विक आधार पर स्वास्थ्य मुद्दों को बताने के लिये यूएन के तहत काम करने वाली डबल्यूएचओ एक बड़ी स्वास्थ्य संगठन है। विभिन्न विकसित देशों से अपने स्थापना के समय से इसने कुष्ठरोग, टीबी, पोलियो, चेचक और छोटी माता आदि सहित कई गंभीर स्वास्थ्य मुद्दे को उठाया है। एक स्वस्थ् विश्व बनाने के लक्ष्य के लिये इसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वैश्विक स्वास्थ्य रिपोर्ट के बारे में इसके पास सभी आँकड़े मौजूद हैं।
विश्व स्वास्थ्य दिवस कैसे मनाया जाता है
लोगों के स्वास्थ्य मुद्दे और जागरुकता संबंधित कार्यक्रम के आयोजन के द्वारा कई जगहों पर विभिन्न स्वास्थ्य संगठनों सहित सरकारी, गैर-सरकारी, एनजीओ के द्वारा विश्व स्तर पर विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। खबर, प्रेस विज्ञप्ति आदि साधन के द्वारा मीडिया रिपोर्ट के माध्यम से अपने क्रियाकलाप और प्रोत्साहन पर भाग लेने वाले संगठन रोशनी डालते हैं।
विश्व भर के स्वास्थ्य मुद्दों पर सहायता के लिये अपनी प्रतिज्ञा के साथ विभिन्न देशों से स्वास्थ्य प्राधिकारी उत्सव में भाग लेते हैं। मीडिया क्षेत्र की मौजूदगी में अपने स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिये लोगों को बढ़ावा देने के लिये स्वास्थ्य के सम्मेलन में विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप किये जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस के लक्ष्य को पूरा करने के लिये विषयों से संबंधित चर्चा, कला प्रदर्शनी, निबंध लेखन, प्रतियोगिता और पुरस्कार समारोह आयोजित किये जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य दिवस क्यों मनाया जाता है
तंददुरुस्त रहन-सहन की आदत के प्रोत्साहन और लोगों के जीवन के लिये अच्छे स्वास्थ्य को जोड़ने के द्वारा जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने में विश्व स्वास्थ्य दिवस ध्यान केन्द्रित करता है। एड्स और एचआईवी से मुक्त और स्वस्थ दुनिया बनाने के लिये उन्हें स्वस्थ बनाये और बचाने के लिये इस कार्यक्रम के द्वारा आज के जमाने के युवा को भी लक्ष्य बनाया जाता है।
खून चूसने वाले और रोगाणु के कारण बीमारीयों के व्यापक फैलाव से मुक्त विश्व बनाने के लिये डबल्यूएचओ के द्वारा बीमारी फैलाते वेक्टर जैसे मच्छर (मलेरिया, डेंगू बुखार, फाईलेरिया, चिकनगुनिया, पीला बुखार आदि) चिचड़ी, कीट, सैंड फ्लाईस, घोंघा आदि को भी लोगों की नजर में ला रही है। वेक्टर और यात्रीयों द्वारा एक देश से दूसरे देश में वेक्टर के जन्म से फैलने वाली बीमारी से ये उपचार और रोकथाम उपलब्ध कराती है। बिना किसी बीमारी के जीवन को बेहतर बनाने के लिये लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिये अपना खुद का प्रयास लगाने के लिये वैश्विक आधार पर डबल्यूएचओ विभिन्न स्वास्थ्य प्राधिकारीयों को मदद देता है।
इसके कुछ लक्ष्य है कि क्यों इसे वार्षिक तौर पर मनाया जाता है, यहाँ नीचे उपलब्ध है।
उच्च रक्त चाप के विभिन्न कारण और बचाव के बारे में जागरुकता को बढ़ाना।
विभिन्न बीमारीयों और उनकी जटिलताओं से बचाने के लिये पूरा ज्ञान उपलब्ध कराना।
पेशेवर से चिकित्सा का अनुसरण और उनके रक्तचाप को बार बार जाँच करने के लिये सबसे ज्यादा अतिसंवेदनशील लोगों के समूह को बढ़ावा देना।
लोगों को खुद का ध्यान रखने के लिये प्रोत्साहित करना।
अपने देश में स्वस्थ पर्यावरण को उत्पन्न करने में अपने खुद के प्रयास लगाने के लिये विश्व स्तर पर स्वास्थ्य प्राधिकारियों को प्रेरणा देना।
रोग असुरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को बचाना।
यात्रा के दौरान वेक्टर से जन्म लेने वाली बीमारी से कैसे बचा जाये के बारे में यात्री को सिखाना और उनको एक संदेश भेजना।
इस संगठन का दायित्व स्वास्थ्य संरक्षण के साथ सुरक्षा देना हैं .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104 पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753
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 (फलों का राजा )

आम खाने के फायदे और नुक़सान-----…विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल /पुणे
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जैसे कि आप सभी जानते है दुनियां में सबसे ज्यादा आम भारत में पाए जाते है।कहा जाता है कि भारत में लगभग 4000 वर्षो से आम की खेती की जाती है।और अकेले भारत में ही सैकड़ों प्रकार की आम की प्रजातिया पायी जाती है। और सभी का अलग अलग स्वाद और रंग है।
आम को फलों का राजा क्यों कहते है
आप को यह जानकर खुशी होगी कि आम को फलों का राजा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये फल स्वादिष्ट होने के साथ साथ अपने अन्दर सैकड़ों लाभकारी गुण समेटे बैठा है।जिसमे की आज हम इसके प्रभावशाली गुणों के बारे में बताएंगे जो कि बहुत ही ज्यादा खास है।और अगर आपने आम के इन प्रभावशाली गुणों को जान लिया तो आपके अंदर आम के प्रति सम्मान और भी ज्यादा बड़ जाएगा ।
आम के बारे में कुछ अनसुनी बातें हैं पहले इन पर एक नजर डालते है
आम को सभी फलों का राजा स्वीकार किया गया है और इसके लिए सभी फलों की सहमति ली गई थी.
क्या आप जानते है आम का पेड़ 100 फुट तक बढ़ सकता है और ये 300 साल तक जीवित रह सकता है.
आम 4000 साल पहले भारत में उगाया गया था जिसके बाद ये पूरी दुनियां में अपने गुणों और शख्त मिठास के चलते प्रचलित हो गया।
क्या आपको मालूम है कि भारत में आम के पत्तों का इस्तेमाल शादियों में भी किया जाता है ताकि विवाहित जोड़े को संतान की प्राप्ति हो सके.
आम के 100 प्रकार पाए जाते है जो कि भारत समेत पूरी दुनियां में खाये जाते है और सभी का अलग रंग और अलग स्वाद होता है
फायदे
कैंसर जैसी भयानक बीमारी से लडने में मदद.
आम कैंसर जैसी भयानक बीमारी से लडने में हमारी मदद करता है। क्योंकि आम के अन्दर एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते है जैसे कि आइसोक्वेरिट्रिन, क्वेरसेटिन, फिसेटिन, गैलिक एसिड, मिथाइल, एस्ट्रैगलिन और गेलेट आम के ये सभी गुण हमारे शरीर को पेट के कैंसर, स्तन कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर जैसी भयानक बीमारी से बचाता है।
खाने को सही तरीके से पचाने में मदद.
खाने को जल्दी पचाने में आम एक अहम भागीदारी पेश कर सकता है। क्योंकि आम के अन्दर इसे ऐसे एंजाइम्स होते है जो कि प्रोटीन को छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ देते है जिससे हमारा पाचन तंत्र खाने को जल्दी पचा लेता है, और क्या आप जानते है हरे आम के अन्दर पके हुए आम की तुलना में ज्यादा पेक्टिन फाइबर पाया जाता है।
ह्रदय को सुरक्षा प्रदान करना
आम के अन्दर भरपूर मात्रा में पोषक तत्त्व पाए जाते है जो कि हमारे हॄदय(दिल) को बहुत सी बीमारियों से बचाते है, ये हमारे शरीर को पोटेशियम और मैग्नीशियम प्रदान करता है जो कि एक स्वस्थ नाड़ी को बनाए रखने में काफी मदद करता है और रक्त वाहिकाओं को निम्न रक्तचाप (यानि लो ब्लड प्रेशर) के स्तर को बढ़ावा देता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देना।
आम को एक अच्छा इम्यूनिटी बूस्टर भी कहा जाता है अगर आप पूरे दिन भर में 165 ग्राम आम का जूस पीते हो तो ये आपके पूरे दिन भर की विटामिन ई की ज़रूरत का 10% भाग को पूरा करता है
आंखो की रोशनी बढ़ाने में बढ़त और उनको सुरक्षा प्रदान करना.
आम के अन्दर ज़ेक्सैंथिन, ल्यूटिन,और विटामिन ए पाया जाता है।ज़ेक्सैंथिन और ल्यूटिन हमारी आखो को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाता है। और विटामिन ए से हमारी आखों की रोशनी को बढ़ाने में मदद मिलती है।
वजन बढ़ाने में सहायक
जो लोग अपने वजन से परेशान रहते है दुबले पतले है उनके लिए आम बहुत ही लाभकारी साबित हो सकता है, आप आम और दूध का शेक बना कर पी सकते है इससे आपके शरीर को कम वजन की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। अगर आप एक महीने तक लगातार मैंगो मिल्क शेक पीते है तो इससे आपको अपने शरीर पर काफी अच्छा असर देखने को मिलेगा और अपका वजन बढ़ने लगेगा।
नई रक्त कोशिकाओं का निर्माण
आम के अन्दर विटामिन बी 6 और विटामिन सी पाया जाता है जिसके कारण आम नई रक्त कोशिकाओं के निर्माण में काफी फायदेमंद है और आम एनीमिया, हेजा जैसी घातक बीमारी से लडने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है
क्या आप जानते है आम के अन्दर एक दर्जन से भी ज्यादा अलग अलग प्रकार के पॉलीफेनोल्स होते है जो कि बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली होते है
पॉलीफेनोल्स: पॉलीफेनोल्स क्या होता है दरअसल ये हमारे शरीर के अंदर एंटीऑक्सिडेंट के रूप में काम करते है
हमारे बालों और त्वचा के लिए फायदेमंद
आम के अन्दर विटामिन ए पाया जाता है जो कि हमारी त्वचा और बालों के लिए काफी फायदेमंद होता है और ये हमारी त्वचा में झुर्रियों को आने से भी रोकता है और बालों को स्वस्थ रखने में मदद करता है
शारीरिक क्षमता को बढ़ाने में मदद
आम पुरुषों और महिलाओं के लिए काफी फायदेमंद होता है आम के अन्दर विटामिन ई, फोलिक एसिड विटामिन बी 6,और पॉलीफेनोल्स पाया जाता है जो कि पुरुषों और महिलाओं के बांझपन को बढ़ाने में मदद करता है एक शोध के अनुसार ये पाया गया है कि जिन पदार्थों को सेक्स जीवन में सुधार के लिए जाना जाता है, वे सभी इन पोषक तत्वों की उपस्थित के कारण है
क्या आप जानते है आम जब कच्चा होता है तो उसमे विटामिन सी की मात्रा अधिक मात्रा में पाई जाती है
वहीं जब एक आम पूरी तरह से पक जाता है तो आम के अन्दर विटामिन ए की मात्रा अधिक हो जाती है
आम इसका हिन्दी नाम है लेकिन आम का वैज्ञानिक नाम मेंगीफेरा इंडिका है।
पूरी दुनिया में फलों में सबसे ज्यादा खाया जाने वाला फल आम ही है। जो कि पूरी दुनियां में सबसे ज्यादा खाया जाता है।
क्या आप जानते है भारत के साथ साथ पाकिस्तान और फिलीपींस का राष्ट्रीय फल आम है।
पूरी दुनियां में सबसे ज्यादा आम भारत में होते है।
क्या आप जानते है भगवान बुद्ध ने भी आम के पेड़ के नीचे बैठ कर तपस्या करी थी।
. ज्यादा आम खाने के नुकसान
अगर आपने हद से ज्यादा आम खा लिए तो इससे क्या हो सकता है जैसे कि आप सभी जानते है कि हर चीज़ को खाने की एक लिमिट होती है और उसको एक लिमिट में खाया जाता है और अगर आपने आम को हद से ज्यादा खा लिया तोह इससे आपको पेचिस, अपच उल्टी भी हो सकती है
ध्यान रहे अगर आपने ज्यादा आम खा लिए तो इससे आपका ब्लड शुगर लेवल बढ जाएगा , अगर आप डाइबिटीज के मरीज़ है तो आपको ज्यादा आम नहीं खाने चाहिए|
अगर आप ज्यादा आम खाते है तो इससे आपका वजन भी बढ सकता है।
क्या आप को इस बात का पता है कि जिन मरीजों को डाइबिटीज होती है उनको कम से कम आम खाने की सलाह दी जाती है।
ज्यादा आम खाने से कील मुहासी भी निकल सकते है इसलिए संतुलित मात्रा में ही आम खाए.
जिन लोगो को आम खाने से एलर्जी हो जाती है वो दिन में बस एक ही आम खाए ज्यादा आम खाने से बचें.
नशा उतारने में आम फायदेमंद
क्या आप जानते है अगर आपने ज्यादा ड्रिंक कर ली और अब आपको ज्यादा नशा चढ़ गया तो नशे के प्रभाव को कम करने के लिए भी आम का सेवन करवाया जाता है आम का सेवन करने से नशे का हैंगओवर कम हो जाता है.अक्सर देखा जाता है लोग शादियों और पार्टियों में ज्यादा मात्रा में ड्रिंक कर लेते है और उनका नशा कम करने के लिए तब आम काफी कारीगर साबित हो सकता है
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104 पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753
वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे ४११०२७
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 हिंदी भाषा का हमारे जीवन में महत्व --------------विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल/पुणे

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हिंदी हमारे देश की सर्वमान्य भाषा हैं .देश विविधताओं से भरा पड़ा हैं ,अनेक जातियां अनेक प्रदेश और अनेक भाषाएँ हैं .चूँकि हम हिंदी भाषी क्षेत्र में रहने से हिंदी हमारी मातृ भाषा हैं और हमें उस पर गौरव हैं क्योकि वह परिपूर्ण भाषा हैं .अपने देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हैं .आज सौ वर्ष से अधिक समय हो चूका राष्ट्रभाषा नहीं बन पायी .और अनेकों अंग्रेजी के शब्द हिंदी में समाहित हो चुके हैं .आज कोई भी अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में नहीं पढ़ाना चाहते .जबकि हमारी भाषा बहुत सुगम ,लालित्यपूर्ण और विशाल शब्दकोष से परिपूर्ण हैं .
‘हिंदी-दिवस’ भारत की राजभाषा हिंदी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। राजभाषा के रूप में हिंदी को तो बहुत पहले ही संविधान द्वारा मान्यता दे दी गयी और एक तिथि निश्चित कर दी गयी कि एक दिन हिंदी के नाम किया जाए। निस्संदेह यह दिन हिंदी के लिए बहुत ख़ास है क्योंकि इस दिन केवल हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि अन्य अहिन्दी भाषी स्थानों पर भी हिंदी भाषा से संबंधित बहुत से कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। सरकार भी इस दिन एक मोटी रकम ख़र्च करके यह साबित कर देती है कि हाँ! उसे आज भी हिंदी के अस्तित्व को बनाये रखने की चिंता है और हम भी यह सोच कर खुश हो जाते हैं कि चलो भई, कम से कम एक दिन तो हिंदी को सम्मान मिला। लेकिन क्या यह वाकई में सम्मान है या हम हर वर्ष हिंदी दिवस मनाकर राजभाषा हिंदी के मुंह पर थप्पड़ मार रहे हैं?और कभी कभी हिंदी की वकालत अंग्रेजी में भी की जाती हैं .
साल में एक बार उन्हीं को याद किया जाता है जो हमसे बहुत दूर चले गए हों। हर वर्ष उन्हीं की तस्वीरों पर फूल चढ़ाये जाते हैं जिनकी वापिस आने की कोई उम्मीद नहीं होती। तो यानी हम यह मान चुके हैं हिंदी हमसे बहुत दूर जा चुकी है और उसको अब वापिस नहीं लाया जा सकता? अब तो केवल हम वर्ष में एक बार हिंदी को याद करके उसकी बरसी मनाकर खुश हो जाया करते हैं कि हाँ! कभी ऐसी भी कोई भाषा थी। आप में से कुछ को यह पढ़कर अटपटा लगे। आप में से कुछ यह भी कह सकते हैं कि हिंदी-दिवस हिंदी भाषा को सशक्त करने के लिए मनाया जाता है। उस दिन तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, आदि आदि, लेकिन माफ़ कीजिये, पूरे वर्ष जिस भाषा की उपेक्षा की जाती हो, एक ही दिन में वह भाषा सशक्त कैसे हो जायेगी? अगर हिंदी भाषा इतनी ही सशक्त होती तो उसे याद करने के लिए हमें किसी दिन की आवश्यकता नहीं होती।
हम पूरे वर्ष को हिंदी-दिवस के रूप में मनाते। आपने कभी इंग्लिश-डे या अंग्रेजी-दिवस सुना है या फ़ारसी या उर्दू या कन्नड़ या स्पेनिश या रशियन। (हो सकता है आप में से कुछ लोगों ने सुना हो लेकिन मैंने कभी नहीं सुना, यह भी हो सकता है कि मेरी जानकारी कम हो) अधिकतर का जवाब न होगा। हो सकता है आपमें से कुछ बुद्धिजीवी लोग मेरी इस बात को नकार दें। लेकिन मुझे उन बुद्धिजीवियों की चिंता नहीं है। चिंता है तो बस इतनी कि आज हिंदी जगत के लोग ही हिंदी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। हिंदी-दिवस के दिन हम तरह – तरह के आयोजन करते हैं। लेकिन हमने कभी सोचा है कि आजकल की युवा पीढ़ी का हिंदी की ओर झुकाव कम क्यों है? कुछ लोग इसके लिए वैश्वीकरण का हवाला देंगे तो कुछ कहेंगे कि हिंदी में स्कोप नहीं है? या ज्यादा से ज्यादा यह स्वीकार लेंगे कि हिंदी पढ़कर केवल हिंदी का अध्यापक बना जा सकता है, इससे आगे नहीं जाया जा सकता इत्यादि। असल बात है यह है कि हम जो हिंदी भाषी होने का दावा करते हैं हम लोगों के अन्दर ही एक भय विद्यमान है कि हिंदी का कोई भविष्य नहीं है। इस भय का सबसे बड़ा कारण है यह है कि हम लोग हिंदी में ज्यादा से ज्यादा कार्य करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उस कार्य में नयापन कैसे लायें, इस ओर ध्यान नहीं देते। हिंदी में अधिक से अधिक शोध हों इसके लिए तो तत्पर रहते हैं लेकिन वो शोध सार्थक हों, इस ओर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। हिंदी को अधिक से अधिक लोगों तक कैसे पहुंचाए इस विषय के बारे में सोचने के बजाय हिंदी-दिवस पर कितने अधिक से अधिक कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं, यह सोचते हैं। दरअसल हिंदी आज उस मुकाम पर है जहाँ हिंदी के महत्व को बताना आवश्यक नहीं है, निहायत ज़रूरी है। हिंदी के प्रति लोगों के मन में सम्मान पैदा करना, उसे जानने की, समझने की ललक पैदा करना और ऐसा तभी हो सकता है जब हिंदी के साथ कुछ ऐसे प्रयोग किये जाएँ जिससे हिंदी में लोगों की रूचि बढ़े। हालाँकि इस दिशा में मीडिया ने अपने कदम जमा लिये हैं। पत्रकारिता के द्वारा काफी हद तक हिंदी का वर्चस्व बढ़ा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है यह है कि इस क्षेत्र के भीतर जाते ही लोग हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य को भूल कर केवल हिंदी का व्यवसाय करने लगते हैं। लेकिन इसके बावजूद हिंदी में मीडिया के महत्व को झुठाया नहीं जा सकता। हिंदी को बढ़ावा आजकल के सिनेमा जगत से भी मिल रहा है।
कई विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो कि हिंदी फिल्मों की भाषा, पटकथा इत्यादि पर शोध करवा रहे हैं। यह हिंदी में एक नया प्रयोग है और हिंदी भाषा को ऐसे प्रयोगों द्वारा ही सशक्त बनाया जा सकता है। लेकिन हिंदी फिल्मों पर काम करना अभी-भी इतना सरल नहीं है कुछेक लोग इसके विरोध में नज़र आते हैं क्योंकि वह हिंदी सिनेमा को साहित्य का अंग मानने से इनकार करते हैं और जो स्वीकारते हैं, वह ज़्यादातर साहित्य पर बनी फिल्मों पर ही कार्य करवाना चाहते हैं या करते हैं जबकि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हमें उसे एक दायरे में बाँध कर नहीं रखना होगा, उसके लिए विभिन्न पट खोल देने होंगे ताकि कम से कम भारत में तो सभी प्रान्तों के लोग हिंदी में कार्य नहीं कर सकते तो कम से कम हिंदी समझ और बोल तो सकें।
आजकल सभी विश्वविद्यालयों में भाषा सम्बन्धी विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। देश-विदेश की विभिन्न भाषाओँ जैसे – चाइनीज़, स्पेनिश, रशियन, फ्रेंच इत्यादि। लेकिन अगर हिंदी की बात की जाये तो उसे सिखाने के लिए कोई अलग से पाठ्यक्रम का प्रावधान नहीं है। यह बात और है कि जिसे हिंदी सीखनी होती है उसे प्राइवेट ट्यूटर्स मिल जाते हैं लेकिन विश्वविद्यालयी स्तर पर ऐसी पहल नहीं की गई है। ऐसा क्यों? क्योंकि हम यह मानकर बैठ गए हैं कि हिंदी भाषा को कोई शायद सीखना ही नहीं चाहता है। कभी हमने यह सोचा ही नहीं कि भारत के कुछ ऐसे प्रांत भी हैं जहाँ हिंदी का बिलकुल भी प्रचलन में नहीं है। ऐसे लोग जब हिंदी भाषी क्षेत्रों में आकर शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनके पास अंग्रेजी का चुनाव करने के अलावा कोई विकल्प इसलिए नहीं होता क्योंकि अगर वह हिंदी पढ़ना चाहेंगे तो उनके लिए कोई ऐसा विशिष्ट पाठ्यक्रम विद्यमान ही नहीं है जो उन्हें हिंदी सीखने में मदद कर सके। लिखना नहीं तो कम से कम उन्हें पढ़ना और हिंदी में बातचीत करनी ही आ जाए (कुछ संस्थाओं ने इस और कदम उठाये हैं – दिल्ली विश्वविद्यालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान एवं यूजीसी ने इस ओर पहल की है)। अगर हम ऐसे लोगों के लिए लैंग्वेज कोर्सेज में ही हिंदी भी रख दें जिसमें केवल विदेशी ही नहीं देसी लोग भी हिंदी सीख सकें तो यह हिंदी की महत्ता को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगा। देखा जाए तो इस मामले में विदेशी देश हम से आगे हैं जो कि हमारे देश के पुराण, उपनिषदों का अध्ययन करने के लिए हिंदी की शिक्षा दे रहे हैं। हिंदी दिवस को हर वर्ष धूम-धाम से मनाने की बजाय अगर इन छोटी-छोटी बारीकियों पर ध्यान दिया जाए तो ‘हिंदी’ को वर्ष में एक बार याद करने की आवश्यकता ही नहीं होगी, ज़रूरत है तो हिंदी सिखाने के पुराने तरीकों को त्यागने की जैसे -कक्षा शिक्षण में व्याख्यान के अलावा पॉवर पॉइंट जैसे डेमोंसट्रेशन मेथड से पढ़ाना या सिखाना। दृश्य-श्रव्य माध्यम से व्यक्ति जल्दी सीखता है। इसलिए ज़रूरत है कि हिंदी में भी इन उपकरणों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जाए। हालांकि इस क्षेत्र में केंद्रीय हिंदी संस्थान ने कई कदम उठाए हैं – हिंदी से सम्बंधित कई प्रकार की सीडी और ऑडियो उन्होनें अहिंदी भाषी लोगों के लिए तैयार की हैं ताकि वह हिंदी सीख सकें लेकिन अभी इस दिशा में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।
इसके अतिरिक्त हमें अन्य भाषाओँ की रचनाओं के हिंदी अनुवाद पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, हालांकि इस सन्दर्भ में कुछ विश्वविद्यालय एवं हिंदी संस्थाएं सराहनीय कार्य कर रही हैं। लेकिन अभी भी केवल हिंदी अनुवाद ज्यातर साहित्यिक क्षेत्र में हो रहा है। अगर विभिन्न पाठ्यक्रमों की बात की जाए तो इसमें अभी-भी कई तरह की मुश्किलें हैं। अव्वल तो उच्च शिक्षा में विज्ञान, जीव-विज्ञान, प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हिंदी में पाठ्यक्रम न के बराबर उपलब्ध हैं और अगर हैं भी तो उनकी भाषा इतनी क्लिष्ट है कि उसको समझ पाना असंभव है। हिंदी अनुवादित रचनाओं या पाठ्यक्रमों की भाषा बहुत अधिक क्लिष्ट नहीं होनी चाहिए। ऐसे पाठ्यक्रमों की भाषा कठिन होने का सबसे बड़ा कारण है कि ज़्यादातर अनुवाद वाक्य या शब्दों के किये जाते हैं उससे निकलने वाले भावों के नहीं। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल शब्दों का अनुवाद करेंगे तो भाषा क्लिष्ट हो जायेगी और ऐसी समझ में नहीं आएगी, परिणामस्वरुप छात्रों का रुझान उस अनुवादित भाषा के प्रति कम हो जाएगा जो कि हिंदी के साथ हो रहा है। इसलिए ज़रूरत है कि किसी भी पाठ्यक्रम या रचना का अनुवाद करते समय केवल उसके शब्दों पर नहीं बल्कि उससे निकलने वाले भावों पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए भले ही हिंदी शब्द न मिले, किसी ओर भाषा के शब्दों का प्रयोग करना पड़े, लेकिन अनुवाद ऐसा हो जो पढ़ने में सरल एवं अर्थपूर्ण हो। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अगर हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना है तो उसमें विभिन्न भाषाओँ के शब्दों को सम्मिलित करना ही होगा दूसरी भाषाओँ या बोली के शब्दों को अपनाने से परहेज़ करना हिंदी के भविष्य के लिए हानिकारक हैं।
हम अगर यह तय कर लें कि ‘हिंदी’ के लिए कोई एक विशेष दिन नहीं बल्कि हर दिन ही विशेष है तो शायद हमें उपर्युक्त कार्यक्रमों को अमल में लाने में देर नहीं लगेगी क्योंकि केवल एक दिन भाषण देने से हिंदी की प्रगति नहीं हो सकती उसके लिए ज़रूरी है हर दिन हिंदी के लिए कुछ विशेष करना। हिंदी की प्रगति का मूल्यांकन आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता बल्कि इस आधार पर किया जाएगा कि हिंदी के लिए कितने लोगों के मन में सम्मान है, कितने लोग ऐसे हैं जिनके मन में अब यह भय नहीं है कि हिंदी का कोई भविष्य नहीं है। भविष्य किसी भी भाषा का नहीं होता, उसका भविष्य हम बनाते हैं। यह हमारे हाथों में है कि भविष्य में हम केवल एक दिन ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनायें या वर्ष के 365 दिन हिंदी के लिए ऐसा कार्य करें कि प्रत्येक दिन ‘हिंदी दिवस’ लगे।
मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय एक सफ़ेद हाथी हैं ,जिसका न भवन निश्चित हैं ,न वहां कोई भी छात्र पढ़ने जाता हैं और वह सैंकड़ों पद रिक्त हैं .वहां पहले एक विचारधारा के लोगों का बाहुल्य था और जिस उद्देश्य से बनाया गया उससे कितना लाभ हुआ यह निश्चित ही जानने का विषय हैं .इसके अलावा हमारे देश में जो कान्वेंट संस्कृति के कारण शिशुओं को शुरुआत से अंग्रेजी ज्ञान के प्रति प्रेरित करते हैं उस कारण उनके कोमल मन पर अंग्रेजी का प्रभाव पड़ता हैं और उसे बाद वे हिंदी से बहुत दूर होते चले जाते हैं ,उनको स्थानीय भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता और न वे कोई भी सामान्य बात को समझते हैं ,जैसे कुर्सी नहीं जानते पर चेयर जानते हैं ,वे ५९ नहीं जानते पर 59 जानते हैं .घर की और अपने आस पास की वस्तुओं से पूर्ण अनिभिज्ञ हैं .इससे भी हिंदी और स्थानीय भाषा को भरी क्षति पहुंच रही हैं .माँ बाप की मज़बूरी हैं क्योकि उन्हें पडोसी के साथ युगानुसार शिक्षा देना अनिवार्य हैं अन्यथा बच्चा पिछड़ जायेगा और तो और ३ वर्ष के पहले से ही उन्हें प्ले स्कूल में डालना और अंग्रेजी माध्यम के बच्चों की पढाई का इतना अधिक बोझ रहता हैं की वे अपनी कहने कूदने की जिंदगी को पढाई में झोक कर अपना बचपन भूल रहे हैं .इतना अधिक पढाई का बोझ होने से वे अभी से तनाव ग्रस्त होते हैं और उनके साथ अभिभावक .
हिंदी में पढ़ने का उतना बोझ नहीं रहता जितना अंग्रेजी में पढ़ाने का .इसके अलावा इतना अधिक कोर्स होता हैं की न जाने हम उन्हें समय से पहले ज्ञानवान बनाना चाह रहे हैं .इस पर भी चर्चा और पुनर्विचार होना चाहिए .अन्य भाषाएँ सीखना अपराध नहीं हैं पर प्रमुखता अपनी मात्र भाषा की होना चाहिए .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्दप्रेमचंद जैन,संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753
You and Sunayana Shah

 (व्यंग्य )

(आधुनिक दाढ़ी---- असंतुलित मन का संकेत )
आधुनिक दाढ़ी का गुप्त संदेश! विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैनभोपाल/पुणे
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सादगी नौजवानी की मौत हैं ,
कुछ न कुछ इलज़ाम होना चाहिए
आज की टीम में एक आदमी होने के लिए, एक दाढ़ी पहनने की जरूरत है। या तो यह जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने सारे के कांटेदार दृश्य से जा रहा होगा। नरेंद्र मोदी से लेकर विराट कोहली तक, सार्वजनिक जीवन में पुरुषों के चेहरे पर बड़ी मात्रा में बाल होते हैं। कुछ लोगों के लिए यह उनकी पहचान का एक स्थायी हिस्सा रहा है, जबकि कई अन्य लोग हैं जिनकी दाढ़ी है क्योंकि हर किसी की दाढ़ी होती है। व्यक्तिगत प्रभाव के सभी रूपों की तरह, दाढ़ी अनिवार्य रूप से संचार का एक रूप है जो इस बात की भावना को प्रसारित करता है कि कौन है और कौन देखना चाहता है।
ऋषि की दाढ़ी, जिसे श्री मोदी ने पहनना शुरू किया है, अपनी मंशा को स्पष्ट करता है। बंगाल चुनावों को देखते हुए, यह रवींद्रनाथ टैगोर के लिए एक इशारा है या नहीं। वर्षों से मोदी की अनुमानित छवि हाथ से काम करने वाले व्यक्ति से एक बुद्धिमान तांडव के रूप में चली गई है, जो मैदान से ऊपर है। एक ऐसे व्यक्ति का निर्माण करना जो एक पसंदीदा बेटे के बंगाल की याद दिलाता है, उसकी चुनावी संभावनाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है।
ऋषि की दाढ़ी उसके प्रचुरता से गहराई से संवाद करती है। श्वेत और अतिप्रवाहित, यह ऐसा है जैसे कि ज्ञान की बाढ़ जो ओरेकल से निकलती है, को अछूता बहने दिया जा रहा है। दो अन्यथा विरोध कोड एक साथ बैठते हैं- उम्र और बहुतायत के। आम तौर पर, उम्र अपनी जागृति और मंदता में लाता है। बहने वाली दाढ़ी को छोड़कर चीजें पतली, सिकुड़ जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं। ऋषि की दाढ़ी का रसीला उन कुछ चीजों में से एक का संकेत बन जाता है, जिन्हें उम्र-ज्ञान के साथ अधिक प्रचुर मात्रा में देखा जाता है। ऋषि और गुरु की दाढ़ी में, आयु पके हुए ज्ञान का पर्याय बन जाती है, जो बिना किसी सोचे-समझे प्रयास के बिना गहरी समझ के एक सहज वसंत कुँए का प्रतिनिधित्व करती है।
स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर आज सबसे ज्यादा प्रचलन में दाढ़ी है, जो विराट ने पहना है। वर्षों के कठिन-जम्मी चमचमाती चिड़ियों की आकांक्षा के बाद, ज्वार कुछ साल पहले बदल गया और यह उन पुरुषों के लिए अनिवार्य हो गया, जो अधिक हिरासती रूप धारण करने के लिए उम्र के आ गए थे। प्रचलन में दाढ़ी को सावधानी से तैयार किया जाता है, तेजी से बनाए रखा जाता है और स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाता है। यह लापरवाह के बजाय उधम मचाने वाले आत्म-अवशोषण का संकेत है
एक की उपस्थिति में उदासीनता। यह एक बुत पर एक मर्दानगी के इरादे की बात करता है, प्रवृत्ति में होने के लिए एक समान पहना जाना चाहिए।
शरीर को तराशने के साथ आधुनिक पूर्व व्यवसाय के साथ, यह मर्दानगी को लागू करने का एक तरीका है, एक प्रदर्शन जो सावधानीपूर्वक ऑर्केस्ट्रेटेड है। 70 के दशक की घंटी की तरह, आज दाढ़ी केवल समय की निशानी है। इसे हर संभव अर्थों में बाहर पहना जाता है। यह आमतौर पर एक अधिक समकालीन बयान करने के लिए मर्दानगी के एक और अधिक आदिम विचार की वापसी के रूप में देखा जाने वाला एक उपकरण का उपयोग करता है। विशेष रूप से हिपस्टर दाढ़ी पोशाक के रूप में दाढ़ी के विचार की अंतिम अभिव्यक्ति है। इसके कई रूपों के अलावा, यह दाढ़ी भाग श्रद्धांजलि है, भाग पैरोडी, क्योंकि यह एक और समय और स्थान से दूसरे की पहचान करती है।
यह कई मायनों में पुरुषत्व की महिमा को पुनः प्राप्त करने का एक प्रयास है, एक ऐसे समय में जब पुरुष सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति से दबाव महसूस करते हैं, लेकिन साथ ही साथ यह इतनी पारदर्शी रूप से एक पोशाक है कि यह खुद को रेखांकित करता है। जबकि सभी मर्दानगी प्रदर्शन का एक कार्य है, दाढ़ी आज बहुत अधिक होशपूर्वक है। आवर्धन, जो एक विशेष प्रकार की दुर्भावना का संकेत है, और फिर भी इसके अनुसार जिस तरह का सावधानीपूर्वक ध्यान ऐतिहासिक रूप से स्त्री के साथ जुड़ा हुआ था, आधुनिक दाढ़ी आत्म-सजग आत्मविश्वास की कमी का एक कार्य है।
सतह पर, वर्तमान रूप मेट्रोसेक्सुअल के विपरीत ध्रुवीय है, लेकिन संरचनात्मक रूप से, अंतर विशाल नहीं है। यह बाहर की ओर पहना जाने वाला मर्दानगी है, इसकी अपर्याप्तता को स्वीकार करते हुए एक अतिरंजित प्रदर्शन पर रखा गया है। आधुनिक दाढ़ी, अपने सभी विविध रूपों में, दाढ़ी के नामकरण और एक संसाधित सांस्कृतिक उत्पाद में इसके रूपांतरण का प्रतिनिधित्व करती है। ग्रूमिंग उत्पादों का एक पूरा आहार दाढ़ी के चारों ओर उग आया है, जो एक बार वाणिज्यिक जंगल में फैल गया था।
दाढ़ी के कई अन्य प्रकार हैं। एक्टिविस्ट की दाढ़ी बेचैनी का एक स्थान है, जो असंतोष की स्थिति है, यह अनजानी और अतिरंजित है, यह आदेश का विरोध करने के लिए निर्धारित है क्योंकि यह एक असंतुष्ट किण्वन विचारों और स्थापना के लिए परेशान करने वाली मुसीबत है। किसी ने भी दुनिया में अन्याय और भेदभाव के वजनदार मुद्दों को पकड़ा, जो दिखावे से परेशान था। दाढ़ी उस व्यक्ति की निशानी है, जो उन चीजों के बारे में पर्याप्त रूप से देखभाल नहीं करता है जो चीजों को करने के लिए गहराई से देखभाल करते हैं।
बेशक, यह देखते हुए कि यह बुद्धिजीवियों के लिए समय-सम्मानित रूप है, अनुरूपता है, केवल दूसरी तरह की।
यह एक दिलचस्प प्राणी है जिसके लिए यह न तो यहां-न-न-चिकित्सा में रहस्योद्घाटन करता है। एक स्तर पर यह एक मर्दाना अतिप्रवाह का संकेत है जिसे न तो नाम दिया जा सकता है और न ही पूरी तरह से महसूस किया जा सकता है। असंतुलित, निंद्रा-रहित दिखना अशांति में मन का संकेत है, जिसमें संतुलन की कमी है। इस राज्य से बॉलीवुड की पकड़ में आए मजनू के लुक को लोकप्रिय बनाया गया। दूसरी ओर डिजाइनर स्टबल, अंडरपैरेडनेस की एक कलात्मक घोषणा है। I त्वचा की दाने और बनावट की खुरदरापन एक मर्दानगी के लिए एक विज्ञापन के रूप में कार्य करता है जो सदा के लिए कार्य-प्रगति है, आराम करने के लिए नहीं। डिजाइनर स्टबल अपने केल्विन क्लेन अंडरवियर में दाढ़ी है, ठाठ परिष्कार के साथ कच्ची मर्दानगी को संतुलित करता है।
दाढ़ी कमजोर-चिन्तक की शरण थी। आज यह ठुड्डी के साथ किसी का भी अभिमान है। दाढ़ी पहनने वाले का अपने चेहरे के बालों से गहरा रिश्ता होता है, और इसे बेहद गंभीरता से लेता है। जबकि एक स्तर पर, यह एक बाहरी संकेत है जो खुद को समय के साथ संरेखित करता है, यह एक आंतरिक महसूस की गई वास्तविकता की एक गहरी अभिव्यक्ति भी है। दाढ़ी की मौजूदा व्यापकता (उदाहरण के लिए हर भारतीय क्रिकेटर एक खेल) के रूप में सबसे अधिक चलन के रूप में फीका पड़ जाएगा, लेकिन जैसे-जैसे लिंग और अधिक तरल होता जाएगा, दाढ़ी प्रयोग के लिए एक लंगर और एक साइट दोनों बनी रहेगी।
बाल बढ़ाये हरि मिले ,सबको लेय बढ़ाय ,
बार -बार के बढ़ाये के ,कोई न गद्दी पाय .
बाल बढाए क्यों रोये ,सबके बढ़ते रोज
जंगल में न आजतक ,कोई न बारबार होय
(साभार)
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्दप्रेमचंद जैन,संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५
सी 3 /५०४ कुंदन एस्टेट कांटे बस्ती पिम्पले सौदागर पुणे 411027