(समसामयिक चिंतन )
(अर्धनग्न अभिनेत्रियों औरआधुनिक महिलाओं की समर्पित)
क्या कम कपड़ा पहनना आधुनिकता का घोतक हैं ----विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन , भोपाल /पुणे
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किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी गुणवत्ता या योग्यता द्वारा जाना जाता हैं और समयानुसार कपड़ो का पहनना भी योग्यता हैं .पहले समय एक डुप्टी कलेक्टर अपनी पदस्थापना पर उपस्थित होने गया .उसने उपचारिकतावश कलेक्टर से मिलने गया .कलेक्टर ने उसे देखकर कोई रिस्पांस नहीं दिया .डिप्टी कलेक्टर बाहर आकर स्टेनो से मिला तो स्टेनो ने कहा आप समुचित ड्रेस पहनकर नहीं आये यानी सूट और टाई .
पहनावा से व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता हैं .आजकल तो सम्पन्न व्यक्ति और स्त्रियां फाटे जीन्स पहनकर आते जाते हैं .फ़टे कपड़ा पहनना गरीबी की निशानी मानी जाती हैं और आज अंग प्रदर्शन करना आवश्यक हो गया .
एक स्त्री के कपड़े उतारने पर महाभारत हो गया था । और अब कपड़े पहनने को बोल दो तो महाभारत हो रहा है।धन्य हो कलयुगी मोर्डन नारी
सब कहते हैं "पेट के लिए तो सब करना ही पड़ता है।" कोई पूछे कि कितना बड़ा पेट है उनका? असल में तन की बात ही नहीं है, सारा झगड़ा मन का है। मन ही तन की ओट में सब झंझट करता है। तन की माँग ही कितनी है?
तन रोटी ही माँगता है, मन माँगता है मक्खन, शीशे की मेज, एयरकंडीशन्ड कमरा, और न मालूम क्या क्या? तन तो दो कपड़ों में ही राजी है, मन को भरी अलमारी भी कम है। नींद चढ़ने पर तन को तो पत्थर से भी परहेज नहीं, मखमली बिस्तर मन को चाहिए। तन को तो छप्पर भी चलता है, पर मन को आलीशान कोठी चाहिए।
तन दो रोटी खाकर कहता है बहुत हो गया, मन कहता है अभी और। शूगर है, तन को मीठा नहीं चलता, मन कहता है ले लो, बाद में दवा ले लेंगे। तन कहे नींद लो, मन कहे कुछ देर तो रुको। तन को कष्ट हो न हो, मन चीख मारता ही है।
देखो, तन अधिक माँगता नहीं, पर मन है कि कम में मानता नहीं। मौत आती है तो तन थोड़े ही विरोध करता है? मन ही बचने के उपाय खोजता है। तो ठीक किसे करना है? तन को या मन को?
एक मित्र ने लिखा है-
" पांच ना मार, पचीसा नै बन्द कर।
जद जानु तेरी रजपुती॥"
पाँच माने पंचतत्वों से बना तन साधने से क्या होगा? हिम्मत है तो पच्चीस से बने मन को रोको! तन तो लाख बार छूट कर भी नहीं छूटता, मन से छूटो, तब बात है।
और तन ठीक करना होता तो बड़ी कठिनाई होती, वह तो जैसा बन गया, बन गया, अब कहाँ से ठोक पीट कर बदलते? पर मन तो विचारों का संग्रह मात्र है। उसे ठीक करना कठिन नहीं, बस सही तरीका मालूम हो जाए।
ध्यान दें, तन और परमात्मा के बीच की कड़ी मन है। यह मन जड़ तन से जुड़े तो दुख है, चेतन परमात्मा से जुड़े तो आनन्द। हैरानी की बात नहीं कि भगवान का एक नाम मनमोहन है, तनमोहन नहीं।
गलती यह है कि हम इसे परमात्मा से भी जोड़ते हैं तो परमात्मा के लिए नहीं जोड़ते, तन के लिए ही जोड़ते हैं।
"हैरान हूँ मैं अपनी बेगार हसरतों पर।
हर चीज़ माँगी तुझसे, तेरे अलावा॥"
लाख मुर्दों को जला कर भी इस मन को चेत नहीं आता, यह फिर से मुर्दे की ओर ही भागता है। ये समझता क्यों नहीं कि यह जगत तो मुर्दों की मंडी है, जो मर चुके वो अतीत के मुर्दे थे, जो अर्थी पर पड़ा है वो वर्तमान का मुर्दा है, जो इसे उठा ले जा रहे हैं वो भविष्य के मुर्दे हैं।
तन को हार पहनाने से क्या होगा? बात तो तब है जब यह मन का हार मनमोहन को पहना दें।
आजकल महिलाओं को कपडा पहनना नहीं चाहती हैं या कम से कम .वे मात्र डेढ़ अंग वो भी पारदर्शी कपडे पहनकर लगता नहीं की वे कपडा पहनती या या नहीं .ये पहनावा पश्चिम की देन हैं इसने तन के साथ मन को विकृत किया और आज यह स्थिति हैं की नारी स्वयं अपना दिखावा करने से नहीं चूँक रही .
आजकल माँ बाप भाई का कोई परहेज़ नहीं रहा .अंग प्रदर्शन आम बात हो गयी .क्या परिधान भी अपराध को उत्प्रेरित करने का एक कारण नहीं हैं .यह जग जाहिर हैं विपरीत लिंगों में आकर्षण होना लाजिमी हैं और होता हैं ब्रह्मा जी भी अपने आपको नहीं सम्हाल पाए थे.
वैसे कोई भी अभिनेत्री साक पाक नहीं रही और न बचने की उम्मीद हैं इसलिए ंग प्रदर्शन से कोई परहेज़ ही होता .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् ,A2 /104 पेसिफिक ब्लू,नियर डी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753
वर्तमान पता --- सी/504 एस्टेट ,कांटे बस्ती , पिम्पले सौदागर ,पुणे ४११०२७
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