Monday, 5 April 2021

 हिंदी भाषा का हमारे जीवन में महत्व --------------विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल/पुणे

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हिंदी हमारे देश की सर्वमान्य भाषा हैं .देश विविधताओं से भरा पड़ा हैं ,अनेक जातियां अनेक प्रदेश और अनेक भाषाएँ हैं .चूँकि हम हिंदी भाषी क्षेत्र में रहने से हिंदी हमारी मातृ भाषा हैं और हमें उस पर गौरव हैं क्योकि वह परिपूर्ण भाषा हैं .अपने देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हैं .आज सौ वर्ष से अधिक समय हो चूका राष्ट्रभाषा नहीं बन पायी .और अनेकों अंग्रेजी के शब्द हिंदी में समाहित हो चुके हैं .आज कोई भी अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में नहीं पढ़ाना चाहते .जबकि हमारी भाषा बहुत सुगम ,लालित्यपूर्ण और विशाल शब्दकोष से परिपूर्ण हैं .
‘हिंदी-दिवस’ भारत की राजभाषा हिंदी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। राजभाषा के रूप में हिंदी को तो बहुत पहले ही संविधान द्वारा मान्यता दे दी गयी और एक तिथि निश्चित कर दी गयी कि एक दिन हिंदी के नाम किया जाए। निस्संदेह यह दिन हिंदी के लिए बहुत ख़ास है क्योंकि इस दिन केवल हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि अन्य अहिन्दी भाषी स्थानों पर भी हिंदी भाषा से संबंधित बहुत से कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। सरकार भी इस दिन एक मोटी रकम ख़र्च करके यह साबित कर देती है कि हाँ! उसे आज भी हिंदी के अस्तित्व को बनाये रखने की चिंता है और हम भी यह सोच कर खुश हो जाते हैं कि चलो भई, कम से कम एक दिन तो हिंदी को सम्मान मिला। लेकिन क्या यह वाकई में सम्मान है या हम हर वर्ष हिंदी दिवस मनाकर राजभाषा हिंदी के मुंह पर थप्पड़ मार रहे हैं?और कभी कभी हिंदी की वकालत अंग्रेजी में भी की जाती हैं .
साल में एक बार उन्हीं को याद किया जाता है जो हमसे बहुत दूर चले गए हों। हर वर्ष उन्हीं की तस्वीरों पर फूल चढ़ाये जाते हैं जिनकी वापिस आने की कोई उम्मीद नहीं होती। तो यानी हम यह मान चुके हैं हिंदी हमसे बहुत दूर जा चुकी है और उसको अब वापिस नहीं लाया जा सकता? अब तो केवल हम वर्ष में एक बार हिंदी को याद करके उसकी बरसी मनाकर खुश हो जाया करते हैं कि हाँ! कभी ऐसी भी कोई भाषा थी। आप में से कुछ को यह पढ़कर अटपटा लगे। आप में से कुछ यह भी कह सकते हैं कि हिंदी-दिवस हिंदी भाषा को सशक्त करने के लिए मनाया जाता है। उस दिन तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, आदि आदि, लेकिन माफ़ कीजिये, पूरे वर्ष जिस भाषा की उपेक्षा की जाती हो, एक ही दिन में वह भाषा सशक्त कैसे हो जायेगी? अगर हिंदी भाषा इतनी ही सशक्त होती तो उसे याद करने के लिए हमें किसी दिन की आवश्यकता नहीं होती।
हम पूरे वर्ष को हिंदी-दिवस के रूप में मनाते। आपने कभी इंग्लिश-डे या अंग्रेजी-दिवस सुना है या फ़ारसी या उर्दू या कन्नड़ या स्पेनिश या रशियन। (हो सकता है आप में से कुछ लोगों ने सुना हो लेकिन मैंने कभी नहीं सुना, यह भी हो सकता है कि मेरी जानकारी कम हो) अधिकतर का जवाब न होगा। हो सकता है आपमें से कुछ बुद्धिजीवी लोग मेरी इस बात को नकार दें। लेकिन मुझे उन बुद्धिजीवियों की चिंता नहीं है। चिंता है तो बस इतनी कि आज हिंदी जगत के लोग ही हिंदी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। हिंदी-दिवस के दिन हम तरह – तरह के आयोजन करते हैं। लेकिन हमने कभी सोचा है कि आजकल की युवा पीढ़ी का हिंदी की ओर झुकाव कम क्यों है? कुछ लोग इसके लिए वैश्वीकरण का हवाला देंगे तो कुछ कहेंगे कि हिंदी में स्कोप नहीं है? या ज्यादा से ज्यादा यह स्वीकार लेंगे कि हिंदी पढ़कर केवल हिंदी का अध्यापक बना जा सकता है, इससे आगे नहीं जाया जा सकता इत्यादि। असल बात है यह है कि हम जो हिंदी भाषी होने का दावा करते हैं हम लोगों के अन्दर ही एक भय विद्यमान है कि हिंदी का कोई भविष्य नहीं है। इस भय का सबसे बड़ा कारण है यह है कि हम लोग हिंदी में ज्यादा से ज्यादा कार्य करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उस कार्य में नयापन कैसे लायें, इस ओर ध्यान नहीं देते। हिंदी में अधिक से अधिक शोध हों इसके लिए तो तत्पर रहते हैं लेकिन वो शोध सार्थक हों, इस ओर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। हिंदी को अधिक से अधिक लोगों तक कैसे पहुंचाए इस विषय के बारे में सोचने के बजाय हिंदी-दिवस पर कितने अधिक से अधिक कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं, यह सोचते हैं। दरअसल हिंदी आज उस मुकाम पर है जहाँ हिंदी के महत्व को बताना आवश्यक नहीं है, निहायत ज़रूरी है। हिंदी के प्रति लोगों के मन में सम्मान पैदा करना, उसे जानने की, समझने की ललक पैदा करना और ऐसा तभी हो सकता है जब हिंदी के साथ कुछ ऐसे प्रयोग किये जाएँ जिससे हिंदी में लोगों की रूचि बढ़े। हालाँकि इस दिशा में मीडिया ने अपने कदम जमा लिये हैं। पत्रकारिता के द्वारा काफी हद तक हिंदी का वर्चस्व बढ़ा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है यह है कि इस क्षेत्र के भीतर जाते ही लोग हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य को भूल कर केवल हिंदी का व्यवसाय करने लगते हैं। लेकिन इसके बावजूद हिंदी में मीडिया के महत्व को झुठाया नहीं जा सकता। हिंदी को बढ़ावा आजकल के सिनेमा जगत से भी मिल रहा है।
कई विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो कि हिंदी फिल्मों की भाषा, पटकथा इत्यादि पर शोध करवा रहे हैं। यह हिंदी में एक नया प्रयोग है और हिंदी भाषा को ऐसे प्रयोगों द्वारा ही सशक्त बनाया जा सकता है। लेकिन हिंदी फिल्मों पर काम करना अभी-भी इतना सरल नहीं है कुछेक लोग इसके विरोध में नज़र आते हैं क्योंकि वह हिंदी सिनेमा को साहित्य का अंग मानने से इनकार करते हैं और जो स्वीकारते हैं, वह ज़्यादातर साहित्य पर बनी फिल्मों पर ही कार्य करवाना चाहते हैं या करते हैं जबकि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हमें उसे एक दायरे में बाँध कर नहीं रखना होगा, उसके लिए विभिन्न पट खोल देने होंगे ताकि कम से कम भारत में तो सभी प्रान्तों के लोग हिंदी में कार्य नहीं कर सकते तो कम से कम हिंदी समझ और बोल तो सकें।
आजकल सभी विश्वविद्यालयों में भाषा सम्बन्धी विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। देश-विदेश की विभिन्न भाषाओँ जैसे – चाइनीज़, स्पेनिश, रशियन, फ्रेंच इत्यादि। लेकिन अगर हिंदी की बात की जाये तो उसे सिखाने के लिए कोई अलग से पाठ्यक्रम का प्रावधान नहीं है। यह बात और है कि जिसे हिंदी सीखनी होती है उसे प्राइवेट ट्यूटर्स मिल जाते हैं लेकिन विश्वविद्यालयी स्तर पर ऐसी पहल नहीं की गई है। ऐसा क्यों? क्योंकि हम यह मानकर बैठ गए हैं कि हिंदी भाषा को कोई शायद सीखना ही नहीं चाहता है। कभी हमने यह सोचा ही नहीं कि भारत के कुछ ऐसे प्रांत भी हैं जहाँ हिंदी का बिलकुल भी प्रचलन में नहीं है। ऐसे लोग जब हिंदी भाषी क्षेत्रों में आकर शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनके पास अंग्रेजी का चुनाव करने के अलावा कोई विकल्प इसलिए नहीं होता क्योंकि अगर वह हिंदी पढ़ना चाहेंगे तो उनके लिए कोई ऐसा विशिष्ट पाठ्यक्रम विद्यमान ही नहीं है जो उन्हें हिंदी सीखने में मदद कर सके। लिखना नहीं तो कम से कम उन्हें पढ़ना और हिंदी में बातचीत करनी ही आ जाए (कुछ संस्थाओं ने इस और कदम उठाये हैं – दिल्ली विश्वविद्यालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान एवं यूजीसी ने इस ओर पहल की है)। अगर हम ऐसे लोगों के लिए लैंग्वेज कोर्सेज में ही हिंदी भी रख दें जिसमें केवल विदेशी ही नहीं देसी लोग भी हिंदी सीख सकें तो यह हिंदी की महत्ता को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगा। देखा जाए तो इस मामले में विदेशी देश हम से आगे हैं जो कि हमारे देश के पुराण, उपनिषदों का अध्ययन करने के लिए हिंदी की शिक्षा दे रहे हैं। हिंदी दिवस को हर वर्ष धूम-धाम से मनाने की बजाय अगर इन छोटी-छोटी बारीकियों पर ध्यान दिया जाए तो ‘हिंदी’ को वर्ष में एक बार याद करने की आवश्यकता ही नहीं होगी, ज़रूरत है तो हिंदी सिखाने के पुराने तरीकों को त्यागने की जैसे -कक्षा शिक्षण में व्याख्यान के अलावा पॉवर पॉइंट जैसे डेमोंसट्रेशन मेथड से पढ़ाना या सिखाना। दृश्य-श्रव्य माध्यम से व्यक्ति जल्दी सीखता है। इसलिए ज़रूरत है कि हिंदी में भी इन उपकरणों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जाए। हालांकि इस क्षेत्र में केंद्रीय हिंदी संस्थान ने कई कदम उठाए हैं – हिंदी से सम्बंधित कई प्रकार की सीडी और ऑडियो उन्होनें अहिंदी भाषी लोगों के लिए तैयार की हैं ताकि वह हिंदी सीख सकें लेकिन अभी इस दिशा में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।
इसके अतिरिक्त हमें अन्य भाषाओँ की रचनाओं के हिंदी अनुवाद पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, हालांकि इस सन्दर्भ में कुछ विश्वविद्यालय एवं हिंदी संस्थाएं सराहनीय कार्य कर रही हैं। लेकिन अभी भी केवल हिंदी अनुवाद ज्यातर साहित्यिक क्षेत्र में हो रहा है। अगर विभिन्न पाठ्यक्रमों की बात की जाए तो इसमें अभी-भी कई तरह की मुश्किलें हैं। अव्वल तो उच्च शिक्षा में विज्ञान, जीव-विज्ञान, प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हिंदी में पाठ्यक्रम न के बराबर उपलब्ध हैं और अगर हैं भी तो उनकी भाषा इतनी क्लिष्ट है कि उसको समझ पाना असंभव है। हिंदी अनुवादित रचनाओं या पाठ्यक्रमों की भाषा बहुत अधिक क्लिष्ट नहीं होनी चाहिए। ऐसे पाठ्यक्रमों की भाषा कठिन होने का सबसे बड़ा कारण है कि ज़्यादातर अनुवाद वाक्य या शब्दों के किये जाते हैं उससे निकलने वाले भावों के नहीं। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल शब्दों का अनुवाद करेंगे तो भाषा क्लिष्ट हो जायेगी और ऐसी समझ में नहीं आएगी, परिणामस्वरुप छात्रों का रुझान उस अनुवादित भाषा के प्रति कम हो जाएगा जो कि हिंदी के साथ हो रहा है। इसलिए ज़रूरत है कि किसी भी पाठ्यक्रम या रचना का अनुवाद करते समय केवल उसके शब्दों पर नहीं बल्कि उससे निकलने वाले भावों पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए भले ही हिंदी शब्द न मिले, किसी ओर भाषा के शब्दों का प्रयोग करना पड़े, लेकिन अनुवाद ऐसा हो जो पढ़ने में सरल एवं अर्थपूर्ण हो। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अगर हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना है तो उसमें विभिन्न भाषाओँ के शब्दों को सम्मिलित करना ही होगा दूसरी भाषाओँ या बोली के शब्दों को अपनाने से परहेज़ करना हिंदी के भविष्य के लिए हानिकारक हैं।
हम अगर यह तय कर लें कि ‘हिंदी’ के लिए कोई एक विशेष दिन नहीं बल्कि हर दिन ही विशेष है तो शायद हमें उपर्युक्त कार्यक्रमों को अमल में लाने में देर नहीं लगेगी क्योंकि केवल एक दिन भाषण देने से हिंदी की प्रगति नहीं हो सकती उसके लिए ज़रूरी है हर दिन हिंदी के लिए कुछ विशेष करना। हिंदी की प्रगति का मूल्यांकन आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता बल्कि इस आधार पर किया जाएगा कि हिंदी के लिए कितने लोगों के मन में सम्मान है, कितने लोग ऐसे हैं जिनके मन में अब यह भय नहीं है कि हिंदी का कोई भविष्य नहीं है। भविष्य किसी भी भाषा का नहीं होता, उसका भविष्य हम बनाते हैं। यह हमारे हाथों में है कि भविष्य में हम केवल एक दिन ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनायें या वर्ष के 365 दिन हिंदी के लिए ऐसा कार्य करें कि प्रत्येक दिन ‘हिंदी दिवस’ लगे।
मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय एक सफ़ेद हाथी हैं ,जिसका न भवन निश्चित हैं ,न वहां कोई भी छात्र पढ़ने जाता हैं और वह सैंकड़ों पद रिक्त हैं .वहां पहले एक विचारधारा के लोगों का बाहुल्य था और जिस उद्देश्य से बनाया गया उससे कितना लाभ हुआ यह निश्चित ही जानने का विषय हैं .इसके अलावा हमारे देश में जो कान्वेंट संस्कृति के कारण शिशुओं को शुरुआत से अंग्रेजी ज्ञान के प्रति प्रेरित करते हैं उस कारण उनके कोमल मन पर अंग्रेजी का प्रभाव पड़ता हैं और उसे बाद वे हिंदी से बहुत दूर होते चले जाते हैं ,उनको स्थानीय भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता और न वे कोई भी सामान्य बात को समझते हैं ,जैसे कुर्सी नहीं जानते पर चेयर जानते हैं ,वे ५९ नहीं जानते पर 59 जानते हैं .घर की और अपने आस पास की वस्तुओं से पूर्ण अनिभिज्ञ हैं .इससे भी हिंदी और स्थानीय भाषा को भरी क्षति पहुंच रही हैं .माँ बाप की मज़बूरी हैं क्योकि उन्हें पडोसी के साथ युगानुसार शिक्षा देना अनिवार्य हैं अन्यथा बच्चा पिछड़ जायेगा और तो और ३ वर्ष के पहले से ही उन्हें प्ले स्कूल में डालना और अंग्रेजी माध्यम के बच्चों की पढाई का इतना अधिक बोझ रहता हैं की वे अपनी कहने कूदने की जिंदगी को पढाई में झोक कर अपना बचपन भूल रहे हैं .इतना अधिक पढाई का बोझ होने से वे अभी से तनाव ग्रस्त होते हैं और उनके साथ अभिभावक .
हिंदी में पढ़ने का उतना बोझ नहीं रहता जितना अंग्रेजी में पढ़ाने का .इसके अलावा इतना अधिक कोर्स होता हैं की न जाने हम उन्हें समय से पहले ज्ञानवान बनाना चाह रहे हैं .इस पर भी चर्चा और पुनर्विचार होना चाहिए .अन्य भाषाएँ सीखना अपराध नहीं हैं पर प्रमुखता अपनी मात्र भाषा की होना चाहिए .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्दप्रेमचंद जैन,संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753
You and Sunayana Shah

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